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Friday, October 6, 2017

किसका निशान ढूँढ रहे हो ?

सोचा कुछ लिखा जाए लेकिन जैसे ही लिखने बैठा सोच में पड़ गया कि क्या लिखा जाए ... ना जाने क्या ढूँढ रहा था लिखने को .... उस तलाश में जब ढूँढना ख़त्म किया तो तब तक कुछ लिख लिया था .... हम सबकी बिखरी हुई तलाशों में कुछ सवालों को इकट्ठा किया ... 


बहते पानी की धार में ,
उस जंग लगी तलवार में ,
बिछड़ी यादों के प्यार में ,
किसका निशान ढूँढ रहे हो ? 

भटकी राहों के जाल में ,
रोज़ सुबहो शाम में ,
शहर नहीं वीरान में , 
किसका मकान ढूँढ रहे हो ? 


धीरे से दबी आवाज़ में ,
कौन से उस  राज़ में ,
न जाने किस अन्दाज़ में ,
किसका नाम पूछ रहे हो ? 

रिश्तों की तस्वीर में ,
मेहनत या तक़दीर में , 
या सोने की ज़ंजीर में , 
किसका दाम पूछ रहे हो ? 

पंछी की ऊँची उड़ान में , 
या नीचे आना थकान में , 
बैठे रहना आराम में , 
किसका सलाम ढूँढ रहे हो ? 

आख़िर किसका मकान ढूँढ रहे हो ? 


- रोहित जोशी 






Saturday, June 7, 2014

हिंदी क्यों ? ठीक है ! लेकिन हिंदी क्यों नहीं ?

कुछ दिन पहले संसद में शपथग्रहण समारोह के दौरान सांसदों को अलग अलग भाषाओँ में शपथ लेते देखा! ख़ुशी हुई , भारत की सांस्कृतिक विरासत का अदभुत दृश्य था!भाषा सांस्कृतिक विरासत का सबसे महत्वपूर्ण अंग माना जाता है! संसद में मानो सभी भारतीय भाषाओ का पूजन हो रहा था, भारत की विविधता का पूजन हो रहा था !मराठी, गुजराती,कन्नड़,ओड़िया,गुजराती इत्यादि और हाँ हिंदी भी! हिंदी ?
फिर अगले दिन एक टीवी चैनल पे बहस होती है की प्रधानमंत्री ने हिंदी में शपथ क्यों ली?प्रधानमंत्री ने यह फैसला क्यों लिया कि विदेशी दौरे पर भी हिंदी ही बातचीत की भाषा होगी! गुजराती,तमिल मराठी आदि भाषाएँ क्यों नहीं? हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं है! एक "बुद्धिजीवी" का कहना था कि विदेशी मामलो में हिंदी बोल के प्रधानमंत्री अपने वोट बैंक को संतुष्ट कर रहे हैं? हिंदी बोलने वाला वोट बैंक ? ये कब पैदा हुआ? आगे बढ़ कर वो बोलते हैं हिंदी सारा देश नहीं बोलता? प्रधानमंत्री हिंदी सब पर थोप रहे हैं?
यहाँ पर सरे बुद्धिजीवी यह भूल जाते हैं कि भारत में बोलने के साथ साथ निश्चित रूप से सबसे  ज्यादा समझने वाली भाषा हिंदी ही है! हिंदी कोई मिश्रित भाषा नहीं है!यह अपने आप में परिपूर्ण है! जब बुद्धिजीवी यह सवाल उठाते है कि हिंदी क्यों? तब इसका सबसे अच्छा उत्तर जो मेरे पास होता है वह है " हिंदी क्यों नहीं?"

क्षेत्रीय भाषा का सीधा सम्बन्ध उस समाज के अस्तित्व से है इसमें कोई दो राय नहीं है और इसका प्रचार प्रसार और संरक्षण उस क्षेत्रीय समाज की जिम्मेदारी है ! लेकिन हिंदी बचाने की जिम्मेदारी किसकी है? हिंदी किसकी भाषा है जब सभी की अपनी अपनी भाषा है? संस्कृत किसकी भाषा थी ? सबने अपनी भाषाएँ बना ली लेकिन संस्कृत की तरफ किसने देखा?यह सभी भाषाओं की जननी थी? कितना सम्मान मिला इसे ?अचानक से कैसे गायब हो गयी ?

यह बताना जरूरी हो जाता है कि यह बुद्धिजीवी तमिल भाषा के "समाजसेवी" थे!
3  साल चेन्नई में नौकरी करने वाले को समझ में आता है कि तमिल भाषायी हिंदी के प्रति कितने उदारवादी हैं?तमिलनाडु जहाँ सिर्फ दो तरह से लोगो को देखा जाता है - तमिल और हिंदी!आप भारत के किसी भी कोने से हो आप तमिल के लिए सिर्फ हिंदीवाला हैं! यह दोहरी मानसिकता क्यों?फिर वही बुद्धिजीवी हिंदी को इस तरह से क्यों देखते हैं? जब तमिलनाडु में सारे देश को हिंदी वाला और तमिलनाडु को तमिलवाला कहा जाता है?

मन में सवाल और बहुत सारे जवाब है लेकिन ज्यादा लम्बा लेख कोई पढता नहीं! इसलिए कभी विस्तार से कहीं और लिखने और बहस करने का मौका मिलेगा तो प्रयास किया जायेगा ! एक बात और है कि मैंने अंग्रेजी के बारे में नहीं लिखा! क्यों कि मुद्दा क्षेत्रीय भाषाओ और अकेली हिंदी का था! अंग्रेजी और हिंदी का संघर्ष कभी और लिखा जायेगा! यह बहुत बड़ा और कठिन संघर्ष है!

हिंदी को अकेला देख के दुःख हुआ तो लिखना जरूरी समझा! क्षेत्रीय भाषाएँ अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं लेकिन यह संघर्ष हिंदी से क्यों? आने वाला समय अंग्रेजी भाषा से संघर्ष का है! अस्तित्व बचाने का है! संस्कृत ने सभी भाषाओ को जन्मा है और हम उसे बचाने में असफल ही रहे हैं! क्यों? यह क्यों का उत्तर अगर मिल गया तो सारी भाषाओ का संरक्षण संभव है!

अभी इतना ही, कहना बहुत कुछ था पर फिर कभी! अभी हिंदी को कुछ सहारा दिया , खुश हूँ!

- रोहित जोशी

Thursday, May 29, 2014

बुद्धिजीवी और बुद्धिजीवी समाज



पहला लेख है हालांकि कवितायेँ और कुछ ग़ज़लें लिखी हैं लेकिन आजकल प्रचलन लेखो का है तो सोचा इसमें भी जोर आजमाइश की जाये !

ट्विटर में, टीवी में और समाज में एक अलग "प्रजाति" ने अचानक से जन्म लिया,जिसे अंग्रेजी में Intellectual और हिंदी में बुद्धिजीवी कहते हैं !सामान्यतः इन्हें किसी भी न्यूज़ चैनल में ज्ञान बांटते और क्रन्तिकारी हरकतें करते देखा जा सकता है ! यह समाज और समाजसेवी हमेशा ज्ञान से परिपूर्ण दिखाई देता है और लगातार किसी भी विषय पे बिना रुके थके ज्ञान बाटते चलता है ! मानो शिव जी की जटाओं से गंगा बह रही हो ! निस्वार्थ, स्वच्छ , निर्मल , पवित्र ! लेकिन इनमें से कोई भी शब्द वर्तमान के बुद्धिजीवी को परिभाषित नहीं करता ! ये अपना "मन" धन के हिसाब से बदलते रहते हैं ! इन्हें गंगा जी में मिलने वाले नाले के पानी के रूप में परिभाषित करना ज्यादा आसान और सम्पूर्ण रहेगा! चलिए आगे बढ़ते हैं -

बुद्धिजीवी या कहें Intellectual समाज दोनों शब्द स्वतः अपने लिए उपयोग करते हैं या किसी और से करवा लेते हैं और समाज की नज़रों में एक अलग जगह बनाने की कोशिश में दिखाई देते हैं !  दोनों ही भाषाओँ में यह शब्द कुछ ज्ञान या समझदारी का बोध कराता है लेकिन मौजूदा हालात और इस समाज की हालत देखते हुए आपको यकीन करना मुश्किल हो जाता है और सोच में पढ़ जाते हैं कि ऐसी कौन सी बाबा जी की बूटी थी जिसे पी के आज ये उस स्तर तक पहुंच गए ? आंकलन किया तो एक ही बात समझ आयी कि इन्हें कोई उत्तर दे तो कहाँ दे ? कैसे दे ? छरछरे पानी में बुलबुले तो बहुत से बन जाते हैं लेकिन देर तक नहीं रहते! बनते हैं और फूटते हैं , यही परिवर्तन है ! जो शायद अब महसूस हो रहा है !

वास्तव में भारत में तर्क और वितर्क किसी भी मुद्दे पे किया जा सकता है,यहाँ की जनता अपने में बहुत कुछ समेटे हुए है! पान की दूकान से ले कर चमचमाते शीशो के पीछे 8 से 5 की नौकरी करने वाले सभी  सारे मुद्दों पर तर्क वितर्क करने को तैयार रहते हैं ! सभी की राय अपने आप में अदभुत और अतुल्य है ! अनुरोध है कि सभी कि "राय" को दिग्गी चचा से जोड़ के ना देखा जाये ! आज सोशल मीडिया ने इस समाज को स्वयं भू बुद्धिजीवी समाज के सामने बहुत ही मजबूती से खड़ा कर दिया है! आज प्रतिस्पर्धा बुद्धिजीवी कुतर्क और अपने "आम" समाज के तर्क वितर्क के बीच है ! ख़ुशी है , गर्व है और भी बहुत कुछ है अब बाकी  भावनाएं समझ लीजिये !

अभी इतना ही , फिर लिखेंगे , फिर मिलेंगे !  TFT या LCD स्क्रीन पे फिर से मुलाकात होगी !

- रोहित जोशी