Friday, October 27, 2017

शाख से टूटे पत्ते

बारिश शुरू होने वाली ही थी और साथ में हवा के भयंकर झोंके भी इशारा कर रहे थे कि जल्दी से घर चला जाये वरना ऑफिस में ही शाम बीतेगी।  वापसी में घर आने की जल्दी थी लेकिन हवा से टूटते हुए, उड़ते हुए , गिरते हुए सूखे पत्ते देखे तो कुछ लिखने को मन कर गया।

टूटे पत्ते की कहानी कुछ जानी पहचानी ही थी।

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शाख से टूटे पत्तों पे .....वो राज़ पुराना किसका था,
वो एक कहानी किसकी थी......वो अफ़साना किसका था।।

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वो ओस की बूँदें पत्तों पे ........ चिपकी थी जैसे मोती हों ,
        वो पत्तों से यूँ छूट गयी.......जाने वो ठिकाना किसका था।
        शाख से टूटे पत्तों पे .......वो राज़ पुराना किसका था।।


वो हवा के झोंको से लड़कर ......  सूखे पत्तों का उड़ जाना ,
        फिर छू जाना पेड़ के पत्तों को .......जाने वो निशाना किसका था।
         वो एक कहानी किसकी थी..... वो अफ़साना किसका था।।

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ऊपर से गिरते पत्तों का ....... जमीं  पे आके खो जाना ,
         मिल जाना बिछड़े पत्तों से........ये गिरने का बहाना किसका था ।
         शाख से टूटे पत्तों पे .......वो राज़ पुराना किसका था ।।


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अलग रंग के पत्तों की ...... कुछ अलग कहानी हो शायद ,
         ना जाने किसको शब्द मिले ......और तराना किसका था 
         वो एक कहानी किसकी थी........ वो अफ़साना  किसका था।


जाने किसकी तलाश में  ....... वो एक पत्ता घूम रहा, 
        यूँ एक अकेली रात में ........वो आवाज़ लगाना किसका था। 
        शाख से टूटे पत्तों पे .........वो राज़ पुराना किसका था।

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उन पत्तों के ही बीच में ........  हम भी सोच में बैठ गए ,
       कि वो प्यार जताना  किसका था ........ और  प्यार छुपाना किसका था।
       शाख से टूटे पत्तों पे ..........वो राज़ पुराना किसका था ,
       वो एक कहानी किसकी थी......वो अफ़साना किसका था।


जब तक ये सब लिखा तब तक बारिश शुरू हो चुकी थी। मैं भी चाय पकोड़े खाने कैंटीन को निकल गया।  बारिश , चाय और पकोड़े ...... आउर का है जीवन में 💚💚💚💚

- रोहित जोशी 





Friday, October 6, 2017

किसका निशान ढूँढ रहे हो ?

सोचा कुछ लिखा जाए लेकिन जैसे ही लिखने बैठा सोच में पड़ गया कि क्या लिखा जाए ... ना जाने क्या ढूँढ रहा था लिखने को .... उस तलाश में जब ढूँढना ख़त्म किया तो तब तक कुछ लिख लिया था .... हम सबकी बिखरी हुई तलाशों में कुछ सवालों को इकट्ठा किया ... 


बहते पानी की धार में ,
उस जंग लगी तलवार में ,
बिछड़ी यादों के प्यार में ,
किसका निशान ढूँढ रहे हो ? 

भटकी राहों के जाल में ,
रोज़ सुबहो शाम में ,
शहर नहीं वीरान में , 
किसका मकान ढूँढ रहे हो ? 


धीरे से दबी आवाज़ में ,
कौन से उस  राज़ में ,
न जाने किस अन्दाज़ में ,
किसका नाम पूछ रहे हो ? 

रिश्तों की तस्वीर में ,
मेहनत या तक़दीर में , 
या सोने की ज़ंजीर में , 
किसका दाम पूछ रहे हो ? 

पंछी की ऊँची उड़ान में , 
या नीचे आना थकान में , 
बैठे रहना आराम में , 
किसका सलाम ढूँढ रहे हो ? 

आख़िर किसका मकान ढूँढ रहे हो ? 


- रोहित जोशी 






Wednesday, October 4, 2017

शास्त्री जयंती और राहुल द्रविड



2 अक्टूबर आते ही एक किस्सा गरमा जाता है , गरमा नहीं जाता बल्कि युद्ध से हालात हो जाते हैं।  ड्राई डे की बात नहीं कर रहा , लाल बहादुर शास्त्री जी और महात्मा गाँधी की बात हो रही है। टीवी से लेकर  मीडिया में गाँधी जी छाए रहते हैं और सोशल मीडिया में शास्त्री जी।  सोच ही रहा था की एक पुराना किस्सा याद आ गया , और शायद कुछ जवाब भी मिले..  कुछ ज्यादा लिख दिया है इसलिए हौसला बनाये रखें और पूरा पढ़ें।  😉

बात स्कूल के समय की है , शायद 10  वीं कक्षा की बात होगी।  दिवाली के समय घर की लिपाई पुताई का जबरदस्त माहौल रहता है , हर साल घर का सारा सामान बाहर रखना फिर पुताई के बाद घर कुछ अलग ढंग से सजाने की कोशिश में घरवालों की छोटी पंचायत लगाना। घर  कुछ अलग सा सजा दिया तो खुद को इंटीरियर डिज़ाइनर टाइप की फील आ जाती है।  
सफाई के समय  अचानक से 2 -3 साल पुराना सामान मिलना और फिर उसे अलग से संभाल कर रखना और अगली पुताई में उसका फिर से गायब हो कर 2 -3  साल बाद अचानक से प्रकट हो जाना।  ये आज भी एक रहस्य ही है और रहेगा।  

खैर पुताई के बाद आता था नए पोस्टर्स और कैलेंडर्स खरीदने का दौर। मैं भी उस रोज घर से सचिन या गांगुली में से किसी एक का पोस्टर खरीदने निकला। सचिन का एक अलग ही भोकाल था।  न जाने कितनी बार स्कूल न जाने के बहाने बनाये और शायद ही बाजार में कोई दुकान बची हो जहाँ रुक कर सचिन की बैटिंग न देखी हो। इण्डिया की बैटिंग आते ही लगता था की जिंदगी का एक ही मकसद है बस भाग के घर पहुंचना और सचिन की बैटिंग देखना। एक गज़ब का दौर था। 

जब दुकान में पंहुचा तो सारे पोस्टर्स को छांटना शुरू कर दिया।   सचिन , गांगुली ,कपिल देव , सलमान खान शाहरुख़ खान सबसे आगे बढ़ता गया की तभी द्रविड  के पोस्टर पे हाथ रुक गए और उसे तुरंत खरीद लिया।  एकदम बड़ा सा पोस्टर।  उस समय द्रविड  के पोस्टर पे हाथ क्यों रुके पता नहीं।  शायद द्रविड  की तस्वीर सामने आते ही समझ आया कि मैं चमक धमक से कुछ अलग चाहता था।  द्रविड चाहता था। 
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सचिन का एक अलग ही करिश्मा था।  उसकी जबरदस्त कवर ड्राइव , नज़ाकत भरा लेग ग्लांस और दरदराती स्ट्रेट ड्राइव। सब कुछ ग़दर था।  इसी चमक के पीछे एक और प्लेयर था,एकदम "भोकाली" डिफेन्स वाला।  बॉल बैट से लगे तो पिच पर ही अंतिम सांसें गिन ले , तो कभी स्क्वॉयर कट का जबरदस्त कहर।  बर्फ सा ठंडा दिमाग लेकिन कोयले जैसा जुझारू, आग पकड़ ले तो गर्मी और चमक दोनों।   ठहराव और स्थिरता वाला वक्तित्व। मिस्टर डिपेंडेबल और मिस्टर वॉल जैसे नाम सार्थक करता हुआ अपना "राहुल द्रविड" 

सचिन और द्रविड़ की तुलना करने का कोई मतलब ही नहीं है। दोनों जरूरी हैं और दोनों एकदम अलग।  सचिन के कई समर्थक होंगे तो कई आलोचक भी। द्रविड़ को गाली देने वाले आज तक नहीं मिले।  क्यों ? इस सवाल का जवाब नहीं है लेकिन शायद द्रविड़ द्रविड़ है इसलिए। 

 2  अक्टूबर का दिन और महात्मा गाँधी - लाल बहादुर शास्त्री जी।  कुछ कुछ सचिन - द्रविड़ जैसा ही। 

गाँधी जी की चमक के पीछे शास्त्री जी की धमक कुछ ऐसे खो जाती है जैसे सचिन की स्ट्रेट ड्राइव के पीछे द्रविड़ का भोकाली डिफेन्स। 

शास्त्री जी को भूल जाना हमारी गलती नहीं है बल्कि "गाँधी" नाम वाली सरकारों की है जिसे शास्त्री , कामराज , नरसिम्हा राव कभी नहीं दिखे , क्यों कि अगर ये दिख जाते तो आने वाली सरकारों के नाम कुछ और  ही होते। इसिहास  नेहरू, गाँधी में ही सिमट के रह गया।  लेकिन कुछ लोग  शास्त्री जी को भूलने नहीं देंगे , ये वही लोग होंगे जो क्रिकेट की चौपाल में  सचिन की बातों के बीच में द्रविड़ के डिफेन्स  की ज्यादा बातें करते हैं।  और ये लोग हम हैं। :) और रहेंगे। 

- रोहित जोशी




Thursday, September 14, 2017

राह राहगीर और मंज़िल



Related imageबहुत दिन हो गए कुछ लिखे हुए , बारिश में झमझमाती बूंदों के बीच एक बुलबुला दिखा जो पानी के साथ बह रहा था। कुछ देर उसे देखता रहा और उसके सफर को समझने की कोशिश की।







बहते पानी में वो बुलबुला, मुझसे नज़रें मिलाना चाहता है ,
         वक़्त कुछ ही बचा है शायद , जल्दी में कुछ बताना चाहता है,
                            लड़खड़ाकर,रूककर, भाग भी रहा है वो ..... - 2
                                          शायद ग़म छुपाकर मुझे हँसाना चाहता है
                                                    बहते पानी में वो बुलबुला नज़रें मिलाना चाहता है।



सोचा कुछ पल रोक कर हाल चाल पूछ लूँ,
        रास्ते में मिली चढ़ाई और ढलान पूछ लूँ ,
                   सफर छोटा सा उसका , पर हौसलों से भरा......-2
                             सफर में थोड़ा आराम और थकान पूछ लूँ
                                      सोचा कुछ पल रोक कर हाल चाल पूछ लूँ।



                                                        बुलबुलों की भीड़ थी , अब अकेला चल रहा हूँ मैं
                                                                     बताया उसने ,कि अब खुद ही संभल रहा हूँ मैं
                                                                                 पानी में बहना है तो पानी से बैर कैसा......-2
                                                                                         वक़्त लगा समझने में , खुद को बदल रहा हूँ मैं
                                                                                                बताया उसने कि अब खुद ही संभल रहा हूँ मैं



मैं मुस्कुराया उसे देख के, अपनी कहानी याद आ गयी,
           कुछ यूँ ही चला था मैं भी,बातें पुरानी याद आ गयी,
                   मिलना बिछड़ना लगा रहा और दिल भी समझ गया .....- 2
                           यादों कि गठरी खुली,वो निशानी याद आ गयी,
                                    कुछ यूँ ही चला था मैं भी बातें पुरानी याद आ गयी




अलविदा कह सका था उसे , कि वो नज़रें हटाना चाहता था,
            सफर पूरा हुआ उसका,वो पानी में समाना चाहता था,
                   कुछ कहने की चाह थी , पर अब वो न था......  - 2
                         फिर मिलेंगे अगले सफर में, मैं ये बताना चाहता था
                                अलविदा कह सका था उसे ,कि वो नज़रें हटाना चाहता था

बुलबुला पानी में मिल चुका था , पानी में ही तो बना था वो।  पानी ही सफर था , पानी ही तकदीर थी  और पानी ही मंज़िल भी। तलाश किसकी थी पता नहीं। कुछ बुलबुले सा ही सफर है अपना भी।

फिर एक नए  सफर की तलाश में  ......
- रोहित जोशी



Tuesday, June 13, 2017

हसरतों के बीज़

आज फिर से कुछ लिखने बैठा हूँ लेकिन आज कुछ कविता या बंधनों में रह के लिखने का मन नहीं कर रहा , आज बस बह जाने का मन है । पुरानी  हसरतों को याद करते हुए नयी ख़्वाहिशों के बीज़ बोने का मन है ।


कभी कुछ हसरतों के बीज़ बोये थे आज फिर से कुछ नए बीज़ बोने का मन है लेकिन साथ में पुरानी हसरतों के जो बीज बोये थे उन्हें भी याद करना ज़रूरी था । क्या पता ये नयी हसरतों के  बीज़ पुरानी हसरतों के साथ ज़मीन बाँट रहे हों या हो सकता है कि कुछ बीज़ बोते ही ख़त्म हो गए और सूखी ज़मीन नयी उम्मीद लगाए बैठी हो । 
ठहराव में उम्मीदें दम तोड़ देती हैं । बहता पानी  ऊर्जा समेटे हुए बस चल पड़ता है , ना रास्ते की परवाह और ना अंजाम से डर । इसी बात को सोच कर नयी हसरतों के बीज़ बोने का मन बना लिया है । 
वो पुरानी हसरतें याद आयी तो उनके बनने और बिगड़ने का दौर भी याद आया । कुछ नाज़ुक बीजों को सजो कर रखते हुए भी उनका हालातों के सामने दम तोड़ देना भी याद आया । हसरतें भीड़ में खो जाएँ तो अलग बात है लेकिन जब  हसरतों को हालात से लड़ने के लिए अकेला छोड़ दिया जाए तो वो ख़ुद "क़ातिल का आत्महत्या" करने से ज़्यादा कुछ नहीं । 

"वो यादों के महल , वो ख़्वाबों के महल ।
वो ख़्वाहिशों की लड़ियाँ , वो नवाबों के महल ।
उलझते हालात और बिखरे हसरतों के धागे ,
वो माँगे हुए पल और हिसाबों के महल ,
वो ख़्वाहिशों की लड़ियाँ वो नवाबों के महल ।।"

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कुछ बीज़ बिना किसी परवाह के किसी भी हालात में बस आगे निकल पड़ते हैं , ये ज़िद्दी क़िस्म के बीज़ हैं जो अपनी क़िस्मत ख़ुद से लिखते हैं। कुछ ऐसे ही बीज़ बोने हैं अब । इस बार हसरतों के बीजों में जिद्द की खाद डाली जाएगी ताकि हालातों को भी लड़ने में तैयारी करनी पड़े । ये कुछ अलग नस्ल,अलग क़िस्म के बीज़ होंगे। 

इस बार फिर से बीजों को बो दिया है और उम्मीद है कि जिद्द की खाद पे बोए हसरतों के बीज़ फूलेंगे और गुलिस्ताँ भी बनेगा । और हाँ जो हसरतें अधूरी रह गयी उनके लिए नए बीज़ बोएँगे और नयी ज़मीन तलाशी जाएगी । उम्मीद है वो हसरतें फिर से खिलेंगी .. उम्मीद पे दुनिया क़ायम है जनाब । ..... बस बहते रहिए ...

-  रोहित जोशी 

Friday, February 3, 2017

पंजाब का घमासान

पंजाब से खबरीलाल की रिपोर्ट :


पंजाब में चुनाव हैं और इसी बीच राहुल गाँधी ने तहलका मचाते हुए चुनावी घमासान में अपनी एक चाल से सारे विरोधियों को जबरदस्त झटका दे दिया है.

आज सुबह सुबह 11 बजे राहुल गाँधी ने एलान कर दिया कि पंजाब चुनाव जीतने पर कांग्रेस पार्टी हल्दीराम भुजिया नमकीन को सारे पंजाब वासियों में मुफ्त बांटेगी. हालाँकि प्रत्येक परिवार को हर दिन 10 रूपये
वाला 1 पैकेट दिया जायेगा. राहुल गाँधी ने बताया है कि कांग्रेस के इस प्रयास से किसानों को आलू उत्पादन और आमदनी में मुनाफा होगा और साथ ही युवाओं को चकना कम पड़ने की समस्या से छुटकारा भी मिल जायेगा. इस घोषणा की हर तरफ जबरदस्त प्रसंशा हो रही है और पंजाब का युवा वर्ग बहुत उत्साहित है. कांग्रेस युवा कमेटी नए नारे के साथ मैदान में उतर आयी है .

"जन जन की है यही पुकार
चकना देगी कांग्रेस सरकार"

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घोषणा के बाद कांग्रेस कार्यकर्त्ता 


सकते में आये विरोधियो में से एक आम आदमी पार्टी के एकमात्र बहुचर्चित नेता अरविन्द केजरीवाल ने इस कदम को हमेशा की तरह 'असंवैधानिक' बता डाला है. आम आदमी पार्टी ने भी चुनाव जीतने पे हर गली में  निम्बू सोडा के फ्री स्टोल लगाने का वायदा कर दिया है. केजरीवाल ने कहा कि भले ही पंजाब में नशे के हालात न सुधरें लेकिन नशेड़ियों की हालत में सुधार आना चाहिए. बरखा दत्त ने भी इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे हैंगओवर को चुनौती देने वाला ऐतिहासिक कदम बताया है.

" पांच साल केजरीवाल , निम्बू सोडा तेरे नाल "  का नारा भी जोर पकड़ने लगा है.


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1 पेग पे मिलने वाले निम्बू सोडा की मात्रा बताते केजरीवाल 


अफरातफरी में अकाली दल ने भी दवाई डिस्प्रिन को फ्री करने का वादा  किया है और हर जेब में एक डिस्प्रिन अनिवार्य रूप से रखने का कानून बनाने में जोर दिया है . बादल बंधुओं का कहना है कि इस फैसले से फार्मा इंडस्ट्री में उछाल आएगा और साथ ही हैंगओवर से होने वाले सर दर्द से राहत भी मिलेगी.  सरकार नशे की हर समस्या से लड़ने के लिए पूरी तरह से कटिबद्ध है.



अमित शाह ने भी बीजेपी की ओर से  नशे की समस्या दूर करने के लिए रजनीगंधा के साथ तुलसी फ्री देने का वादा किया है और जोर देकर कहा है कि इससे युवाओं में नए तरीके के शौक पैदा कर के बाकि समस्याओं से छुटकारा पाया जा सकता है.

नारा है ,
"अबकी बार , रजनीगंधा मेरे यार"

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मिश्रा जी की दुकान के बाहर कार्यकर्ताओं की भीड़



शानदार माहौल है और जनता एक मिली जुली सरकार की आस लगाए बैठी है.
अखिल भारतीय बेवड़ा संघ ने सारी घोषणाओं का स्वागत किया है.

बाकी समाचार चुनावी नतीजो के बाद.


-रोहित जोशी
कार्यकर्ता

Thursday, December 17, 2015

प्रभु केजरीवाल का महाभारत अवतार



यह घटना उस समय की है जब "कलियुग" समाप्ति के बाद द्वापर युग का आरम्भ हुआ. महाभारत अत्यंत रोचक दौर से गुजर रहा था. सेनाएं कौरवों और पांडवों में बँट रही थी और पांडवों ने भगवान श्री कृष्ण को अपने खेमे में लेके आधा मैदान जीत लिया था. दुर्योधन के पास भगवान श्री कृष्ण की सेना थी और वो "बाबा जी की बूटी" वाले गाने को सीरियसली लेते हुए बूटी पिए हुए मस्त था. लेकिन शकुनि मामा ने सही समय पर दुर्योधन के आँखों में जमी हुई 'गुडगाँव की धूल 'साफ़ करी ,बूटी फेंकी और बोले " हे दुर्योधन प्रदुषण बढ़ गया है. गुडगाँव की धूल ने तुम्हारी आँखें बंद कर दी हैं  और लड़कियों ने तुम्हारी साँसे बंद कर दी हैं .गार्नियर मैन फेसवॉश से चेहरा धो के आओ और फिर युद्ध की रणनीति बनाते हैं."


दुर्योधन नें तुरंत एक "पत्निव्रता पति" की तरह आज्ञा का पालन किया और फेयर एंड हैंडसम होकर मामा के पास पहुँच गया. शकुनि मामा इंटरनेट के बहुत बड़े ज्ञानी थे और उन्हें प्रोक्सी सर्वर की 100 से भी ज्यादा साइट्स मुँह जबानी याद थी. उन्होंने द्वापर युग के भगवान श्री कृष्ण को मात देने के लिए कलियुग के युगपुरुष केजरीवाल जी सहायता लेने का मन बना लिया.

शकुनि मामा युगपुरुष को धरती पर लाने के उपाय गूगल में ढूंढने लगे. दुर्योधन ने जैसे ही युगपुरुष केजरीवाल जी के कारनामो के बारे में सुना उसने एक बार अपनी ही जगह पे घूम के "यू टर्न" लेके युगपुरुष को 'सहारा प्रणाम' किया और "आम आदमी ज़िंदाबाद" के पूरे तीन नारे लगाये.

गूगल के पहले 3 पेजों की सारी वेबसाइट छान मारी लेकिन भगवान केजरीवाल के जितने रूप उतने ही उनके धरती पर आने के उपाय. शकुनि मामा तो एकदम कन्फुजिया गए और दुर्योधन ने मन को शांत करने के लिए प्रभु केजरीवाल का ध्यान कर के "यही तो स्कैम है जी" का तीन बार अंतर्मन से उच्चारण किया.

अंत में दुःशासन की मदद ली गयी जो की वेब सर्फिंग का एक माहिर खिलाडी माना जाता था, लेकिन प्रभु केजरीवाल की लीला तो वो ही जानें. यकीन मानिये दुःशासन ने भी हार मान के टॉप 3 वेबसाइट में "आदा पादा" वाले मन्त्र से एक बेस्ट वेबसाइट का चुनाव किया. समस्या दूर हुई और उपाय सामने थे.

प्रभु केजरीवाल का वाहन - आम गिरगिट

पहला उपाय - प्रभु केजरी के वाहन 'गिरगिट' के साथ लाल,पीने, नीले और हरे रंग में सेल्फ़ी
दूसरा उपाय - 1000 लोगों पे अलग अलग तरीके के आरोप लगा के भागना
तीसरा उपाय - प्रभु केजरीवाल के गाये गए ऑस्कर विनिंग भजन " इंसान का इंसान से हो भाईचारा" को बिना रुके हैडफ़ोन पे 10 बार सुनना.

दुर्योधन "कॉर्पोरेट टाइप" आदमी निकला. उसने दूसरा उपाय चुना ताकि लोगो से नेटवर्किंग हो जाये जो आगे चल के काम आये और काम ना आये तो बस कहने को हो कि 1000 लोगों को जानता है.


खैर , 1000 में से 300 लोगों से मार खाने के बाद आखिरकार तपस्या पूरी हुई और XXL साइज का स्वेटर , बिना बेल्ट के एक ढीली से पेंट , काला मफलर और सैंडल धारण किये हुए एक बहुत ज्यादा आम सा दिखने वाला आदमी गिरगिट के ऊपर बैठ कर धरती पर अवतरित हुआ. सारी रणभूमि "आम आदमी ज़िंदाबाद" , "5 साल केजरीवाल" और "यही तो स्कैम है जी"  के नारों से गूंज उठी. अरे यही तो प्रभु केजरीवाल थे! संजय जो धृतराष्ट्र को महाभारत का आँखों देखा हाल बता रहे थे , आम आदमी के भगवान की ऐसी दयनीय हालत देख के उनकी आँखें भर आई और वो भी "5 साल केजरीवाल" का नारा लगाने से खुद को रोक नहीं पाये.


आम आदमी के रूप में प्रकट होते प्रभु केजरीवाल



प्रभु केजरीवाल ने दुर्योधन को "ईमानदारी का सर्टिफिकेट" देते हुए कहा " हे दुर्योधन ! हमने तुम्हारी जांच अपने "लोकपाल" से ही करवा ली है तुम लालू जी से भी ज्यादा ईमानदार हो और आज से हम तुम्हारे साथ हैं!" ये आम आदमी की लड़ाई है. हम और तुम कौन हैं जी .. आम आदमी ही तो हैं.  और इस तरह से प्रभु केजरीवाल ने "आम ज्ञान" देके सबको धन्य किया.

 शकुनि मामा ने चालाकी दिखाते हुए प्रभु केजरीवाल से लड़ाई की "जनरल टर्म्स एंड कंडीशन" के तहत 420 रुपए के बांड "नो यू टर्न" पर दस्तखत ले लिए. लेकिन प्रभु केजरीवाल के आरोपों से कौन भाग पाया है ? प्रभु ने 370 पेजों वाली शीला दीक्षित वाली रिपोर्ट का हवाला देते हुए बांड पेपर को नकली बताया और टर्म्स एंड कंडीशंस कहीं भी "संविधान" में नहीं लिखा है कह कर पेपर जला दिया. प्रभु के इस अद्भुत चमत्कार को देख के शकुनि मामा और दुर्योधन ने अपने आप को प्रभु के चरणों में समर्पित कर दिया और उनके "आंतरिक लोकपाल" में शामिल होने की इच्छा जताई. प्रभु ने "खांस" कर मना कर दिया.

टर्म्स एंड कंडीशंस के पेपर जलाते प्रभु केजरीवाल



तभी ये क्या ? प्रभु ने देखा कि आधी सेना तो उनके कंट्रोल में ही नहीं है और वो पांडवों की तरफ से लड़ रही है .बस फिर क्या था प्रभु पूर्ण स्वराज के साथ पूरी सेना की मांग लेके धरने पे बैठ गए. प्रभु का धरना एक योगी की तपस्या से भी लम्बा होता है. सब धरने के खत्म होने के इन्तेजार में थे.............

प्रभु के धरने में बैठते ही धरती हिलने लगी , भूचाल सा आ गया ... तभी चेहरे पे चटाक एक तमाचा पड़ा और मम्मी
चिल्लाई - उठ जा अब नहीं तो बिस्तर समेत बाहर फेंकती हूँ.

दर्द हुआ लेकिन बड़ा सुकून मिला कि अभी कलयुग चल रहा है और द्वापर तो पहले ही समाप्त हो गया है जिसमे पांडव ही जीते थे और भगवान श्री कृष्ण ने ही गीता ज्ञान दिया था.
तभी पता नहीं किसने कान में चुपके से कहा " यही तो स्कॅम था जी " ;)


  - रोहित जोशी उदास "आम अादमी"


Monday, January 19, 2015

अधूरी कहानी

 आज पुरानी यादों से कुछ गुफ्तगू करने का वक़्त मिल गया वरना तेरी याद आते ही ये दिल शराब की बातें करने लगता है और दिमाग तेरी! और जब दिल दिमाग दोनों मिल जाएं तो वह मेरी रोज की शाम बन जाती है! अब शिकायत मत करना कि मैं रोज शराब क्यों पीता हूँ !
खैर आज यादों से फुर्सत मिली ही थी कि कुछ ख्यालों ने दिमाग पे बड़ी जोर से दस्तक दे दी। और कुछ झूठी बातो के सामने आयना रख दिया।

मेरी दुनिया छोटी थी, मध्यम वर्गीय वाले सपने और वैसे ही उम्मीदें! वक़्त सीमित ही रहता है तो साथ में कुछ अपने से मेल खाने वाले सपने भी बुन लिए ! इसी बीच समझ आया की तुम्हारे सपने मेरी हक़ीक़त से बड़े थे! इतने बड़े कि मन एक कदम एक पल के लिए रुक गए और एक तरफ़ा समझौते! प्यार में समझौते प्यार प्यार में हो जाते हैं लेकिन शायद इनकी भी कुछ सीमाएं होती हैं! ये सीमाएं प्यार करने से पहले नहीं खींची जाती और बाद में खींचना बहुत मुश्किल!

खैर दोनों आगे बढे एक ही मंजिल की तरफ लेकिन शायद धीरे धीरे रास्ते अलग हो रहे थे । मैंने कच्चे रास्ते चुने और उसने पक्की सड़क। मुझे अपने जाने पहचाने रास्तों पे भरोसा था तो उसे पक्की सड़कों की रफ़्तार पर । अब दोनों रास्तों की मंजिलें भी अलग हो गयी थी और दोनों मुसाफिरों की रफ़्तार भी। 

शायद कभी यह कच्चा रास्ता उस पक्की सड़क से जा मिले। पर यह ना मिले तो बेहतर है क्योंकि जब कच्चे रास्ते पक्की सड़कों से मिलते हैं तो ये रास्ते वहीं पे ख़त्म हो जाते हैं। और उनका सफ़र भी। कच्चे रास्तों से अब प्यार सा हो गया है जब कभी ठोकर लगती है और गिरना होता है तो दर्द कम ही होता है वर्ना पक्की सड़कों पे खतरा ज्यादा है। हमें अपने रास्ते मुबारक तुम्हें सड़क।

कहानी अधूरी रही लेकिन पूरी रही ।




Monday, November 10, 2014

"मोदी" - समझने के लिए सीमाएं जरुरी

नरेंद्र मोदी , एक ऐसा नाम जिसे समझने में बहुत से लोगो ने बहुत जल्दी करी और उस समझ को अपने पास रख लिया, कुछ ने दूर से समझा,कुछ ने समझने के बाद उसे नासमझने का भरपूर प्रयास किया और कुछ ने समझने का प्रयास ही नहीं किया!

एक प्रयास किया है नरेंद्र मोदी या कहें किसी को भी परखने के लिए "समझ की सीमाएं" खींचने का! बादलों , समंदर और पर्वतों के द्वारा ! 

नारंगी बादलों की टोली देखी! 
काला,सफ़ेद,भूरा बादल आज नारंगी रंग में मदमस्त झूम रहा है! 
शायद परेशान है शायद खुश!
किसे पता? 
सिर्फ चेहरा ही, पहचान नहीं होता !

समंदर की लहरें,आज कुछ ज्यादा गुस्से में थी,
वापसी में कुछ मोती छोड़ के गयी थी!
शायद नाराज़ थी शायद प्यार में,
किसे पता?
कुछ पल का हिसाब ही , अंजाम नहीं होता!

दूर से नज़र पहाड़ पे पड़ी,कठोर विशाल, भयानक!

लेकिन मिट्टी,पेड़, झरना और फूल सब कुछ समेटे हुए
शायद बाहर से कठोर ,शायद अंदर से मुलायम?

किसे पता?
पत्थर हमेशा कठोरता का प्रमाण नहीं होता !


सिर्फ चेहरा ही, पहचान नहीं होता !



कभी देखने में दिक्कत हो तो जरुरी नहीं कि नज़र ही ख़राब हो , आईने में धूल भी जमी हो सकती है!

- रोहित जोशी





Wednesday, November 5, 2014

स्वच्छ भारत मिशन - सपना या हकीक़त !

स्वच्छ भारत मिशन शुरू हुए बहुत दिन हुए, बहुत कम समय लगा इस मिशन को समझने में लेकिन बहुत ज्यादा समय लगेगा इस मिशन को हकीकत बनते देखने में! मिशन शुरू हुआ और सब में कुछ अजीब सा अटपटा सा सन्देश देता हुआ आगे बढ़ा कि भाई अब सफाई भी कर लो! आपके लिए ही कह रहे हैं!
जब कुछ लोगो को टीवी पे देखा तो ख्याल आया -
भाई गज़ब हुआ
चमत्कार हो गया
आज साल में दूसरी बार लोगो को
देश से प्यार हो गया!
( साल का एकमात्र प्यार बस 15 अगस्त को आता है और 16 अगस्त को चला जाता है!)

इसी बीच एक पढ़ी लिखी प्रजाति का मानुस से मैंने पूछा तो बोलता है कि
भाई अब सब कुछ साफ़ साफ़ रखुंगा
कसम देश की है
सफाई के पल पल का हिसाब रखुंगा!

मज़ा सा आ गया ऐसी बातें सुन के लेकिन तभी उसने डकार लेते हुए खाली lays का पैकेट का पत्थर बनाते हुए कूड़ेदान पे निशाना लगाया और अंडर हैंड थ्रो कर दिया ! निशाना लगाया तो जोंटी रोड्स समझ के लेकिन निशाना सरकारी योजनाओं की तरह सही दिशा से कोसो दूर मंजिल को बस दूर से देख के निकल गया!
अब वो lays का पैकेट उसे दूर से निहार रहा था , अपनी मजिल से दूर .और उसने ohh Shit!  कहते हुआ नजर बचायी और आगे बढ़ गया ! और बिना कुछ कहे सब कुछ कह गया !
मैंने तुरंत बोला - भाई अभी तो सफाई की कसम खायी थी , अब रसम कब निभाओगे ,
जवाब आया - पैकेट पास में ही तो पढ़ा है , अब और कितना करवाओगे ?

गज़ब ! अदभुत !

उसके शब्द मैं निःशब्द !

स्वच्छ भारत मिशन - वाह ! अभियान की शुरुवात कुछ वैसी ही थी जैसे सचिन ने अख्तर की पहली ही बॉल पे स्ट्रैट ड्राइव "डाबर लाल दंतमंजन चौका" दे मारा हो ! और वो सचिन की कातिलाना स्ट्रैट ड्राइव पोज़! गज़ब! और लगा मानो जनता ने सचिन सचिन के नारों से मैदान को ऐसा एलेक्ट्रिफाई कर दिया हो कि सैमसंग स्मार्ट फ़ोन भी २ मिनट में फुल चार्ज हो जाये और साथ में २ दिन बैटरी बैक अप वो भी इंटरनेट चालू रहते हुए ! बड़ा भोकाली माहौल था ! कसम कोबी भेड़िया की!

खैर स्वच्छता मिशन एक बहुत ही अच्छी सोच है लेकिन इसे पूरा किसे करना है ? सरकार को ? सफाई कर्मचारियों को ? या स्वच्छता चैलेंज लेके अच्छी सी फोटो ( अच्छी का अभिप्राय कूड़े के साथ वाली फोटो से है) खिचाने वाली हस्तियों को?
इनमे से किसी को भी नहीं ! यह काम हर किसी है ! आपका है! हमारा है ! हम सबका है!
यह मिशन एक सोच को दिल में बसाने से है ! खुद को अनुशाषित बनाने का है ! वक़्त लगेगा लेकिन एक दिन सोच बदलेगी जब सार्वजनिक संपत्ति को लोग अपनी और देश की संपत्ति कहेंगे!
जिस दिन यह सोच आएगी , भारत बदल जायेगा !


वन्दे मातरम!

रोहित जोशी 

Thursday, June 26, 2014

मैं आरक्षण हूँ!

आज फिर से आरक्षण का मुद्दा राजनैतिक गलियारों की सैर करता हुआ सामान्य वर्ग को चिढ़ाते हुए आगे बढ़ गया !
एक सामान्य वर्ग के लिए आरक्षण क्या है यह वही बता सकता है जो 1 अंक से किसी परीक्षा में असफल हो जाता है और दूसरा  उससे 30 अंक कम में सफल ! शिक्षा में और नौकरी में आरक्षण कैसे योग्यता के साथ न्याय कर पाता है ? क्या यह योग्यता के चयन में "आरक्षण की रिश्वत" नहीं है ?
आज जब एक सामान्य वर्ग एक सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करता है तो सबसे पहले कुल पदों में सामान्य का प्रतिशत देख कर होसला खो बैठता है ! कल्पना करिये 30 पदों में सामान्य वर्ग के 12 पद ? क्या शेष 18 पदो पे आवेदन करने वाले आरक्षण के आधार पे सामान्य वर्ग से योग्यता में ऊपर हो गए ? ये कैसा सामान अवसर देने का तरीका है? जो जिस पद के योग्य नहीं है वो आरक्षण के आधार पे कैसे उस पद को पाने का अधिकार रखता है ?

आरक्षण दीजिये , उसे दीजिये जो आर्थिक आधार पे पिछड़ा हो, और आरक्षण आर्थिक हो! समाज ,जाति और धर्म पे नहीं ! आर्थिक आरक्षण विशेष वर्ग को आवेदन करने का अवसर दे और सुविधा भी ! लेकिन जब परीक्षण हो तब कसौटी सिर्फ योग्यता हो !

आरक्षण या कहें "सामान्य दर्द" को समझती कुछ पंक्तियाँ-

मैं आरक्षण हूँ!

मैं इस सदी के भारत का भाग्यविधाता हूँ,
कम मेहनत में परिणाम का दाता हूँ ,
मैं सामान्य श्रेणी का "रण" हूँ !  ....... मैं आरक्षण हूँ !

मैं जात-धर्म समाज के खेल का ज्ञानी हूँ,
हर "राजनैतिक" भविष्य का अंतरयामी हूँ,
मैं न दिखने वाले अंतर्विरोध का कारण हूँ !......... मैं आरक्षण हूँ !

मैं कहीं एक "सामान्य" मन की निराशा हूँ,
कहीं "विशेष" के लिए अवसरों का तमाशा हूँ !
मैं अंधरों में रौशनी का भक्षण हूँ ! ..........मैं आरक्षण हूँ !

मैं कभी "भावनाओं" की राजनैतिक प्रयोगशाला हूँ!
कभी "कुछ उम्मीदों" के बीच "जहर" का निवाला हूँ !
मैं भविष्य का सबसे बड़ा ग्रहण हूँ ! .............मैं आरक्षण हूँ !


मैं अवसरों के लिए भटकते हुए "मन" का "रोष" हूँ !
ज्ञानी समाज की नज़रों में आज भी निर्दोष हूँ!
मैं "योग्यता" को खरीदने वाला "अदृश्य धन" हूँ!  ..........मैं आरक्षण हूँ !
मैं बंटते हुए समाज के कण कण में हूँ ! ..........मैं आरक्षण हूँ !

सामान्य वर्ग , एक ऐसा वर्ग जिसे आरक्षण औषधि की आदत पढ़ गयी है ! वास्तव में सामान्य वर्ग कुछ नहीं है ! इसी वर्ग में से कभी जाट आरक्षण कभी गुज्जर आरक्षण तो कभी मराठा आरक्षण और न जाने कितने आरक्षण बन गए ! और धर्म के नाम पे आरक्षण तो हमारे देश के राजनैतिक सेकुलरिज्म की परीक्षा है जिसे देश ने हमेशा प्रथम श्रेणी ससम्मान उत्तीर्ण की है ! जल्द ही वक़्त आएगा जब ये सामान्य वर्ग भी अतिसामान्य वर्ग के अंतर्गत आरक्षण की श्रेणी के लिए संघर्ष करता दिखाई देगा ! आज़ादी के 67 साल बाद भी जिस देश में आरक्षण एक "अवसर" मात्र रह जाये उस देश में  आने वाले समय के पास सामाजिक संघर्ष के अलावा कुछ नहीं दिखाई देता !

अभी इतना ही , लेकिन इतना यकीन से कह सकता हूँ कि आने वाली "सामान्य" पीढ़ी समान अवसर के लिए संघर्ष करेगी और यह संघर्ष बहुत कठिन होगा !

- रोहित "सामान्य" जोशी

Wednesday, June 18, 2014

उस पहाड़ी पर एक, मेरा भी मकान था !

केदारनाथ में आई हिमालयी सुनामी को एक साल पूरा हो गया, आज भी वो भयानक दृश्य आँखों को भिगाते हुए आगे बढ़ लेता है! यह सुनामी अपने साथ बहुत कुछ बहाते हुए आगे बढ़ी थी !  इसी बाढ़ में कहीं किसी का पूरा परिवार था तो कहीं किसी के पूरे परिवार का सहारा !  बाढ़ के एक छोर पे किसी का बचपन बह रहा था तो दूसरे छोर पे किसी परिवार के अपने बच्चों के बचपन के सपने! उसी बाढ़ में किसी की आँखों ने उम्मीदों को छटपटाते हुए देखा तो किसी की आँखों ने अपना सब कुछ गंवाते हुए! उसमे जो भी मिला सब बिखर गया !

इसी बिखराव में एक मन को पढ़ने का प्रयास करती कुछ पंक्तियाँ -

उस पहाड़ी पर एक, मेरा भी मकान था !
ज्यादा कुछ नहीं बस, थोड़ा सा सामान था,
एक परिवार था जिसने उसे घर बनाया था
आवाज़ तो लगायी मैंने, पर सब कुछ सुनसान था,
उस पहाड़ी पर , एक मेरा भी मकान था!

एक आँगन भी था , मेरे बचपन की यादें लिए,
वो मुस्कुराते पल और उनसे हुई मुलाकातें लिए,
आँगन छोटा सही पर बड़ा दिल था उसका,
आज वही आँगन मुझसे ज्यादा परेशान था,
उस पहाड़ी पर एक मेरा भी मकान था !
आवाज़ तो लगायी मैंने पर सब कुछ सुनसान था !

वहां एक नन्ही सी परी की खिलखिलाहट भी थी,
नादान सी बातें और प्यारी मुस्कराहट भी थी ,
पता बताया न किसी ने  कि वो कहाँ छुपी थी,
पता नहीं क्यों , सारा शहर ही मुझसे अनजान था ,
उस पहाड़ी पर एक मेरा भी मकान था !
ज्यादा कुछ नहीं बस,थोड़ा सा सामान था !
उस पहाड़ी पर ,एक मेरा भी मकान था !

केदारनाथ में हुए हादसे में मरने वालों को श्रद्धांजलि!

- रोहित जोशी

Wednesday, June 11, 2014

फिर एक शाम गुज़र गयी

और इसी तरह आज की शाम भी गुज़र गयी! हर शाम गुजरने के बाद वो अपने साथ बहुत कुछ समेटे हुए चली जाती है लेकिन फिर से आती है कुछ नयी,कुछ अलग और कुछ कल की उम्मीदें लिए! कभी इस शाम में दिन भर की थकान दिखती है तो कभी इस शाम में आज का सुकून और कल की उम्मीदें दिखती हैं ! शायद हर शाम कुछ कह कर निकल जाती है और सुनने वाला बस कल की शाम का इंतज़ार करता हुआ कल जीने लगता है ! हर शाम कुछ कहते हुए निकलती है , कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं  कुछ शाम की बातें करते हुए !

शायद सबकी शाम कुछ ऐसे ही गुज़रती होंगी!

एक हताश दिन ,खुद को समझाता हुआ दिन - और फिर एक शाम गुज़र गयी !

ख्वाबों को झुठलाती हुई, फिर एक शाम गुज़र गयी !
खुद को बहकाती हुई , फिर एक शाम गुज़र गई !
आंसू भी बेमाने लगे , तेरे सैलाब के आगे,
यूँ सब को रुलाती हुई फिर एक शाम गुज़र गयी!
ख्वाबों को झुठलाती हुई , फर एक शाम गुज़र गयी !

एक और दिन कुछ उम्मीदें लिए,  एक और दिन कुछ हौसला लिए -  फिर एक शाम गुज़र गयी!

कुछ सपने सजाती हुई, फिर एक शाम गुज़र गयी,
अपनी ही धुन गाती हुई ,फिर एक शाम गुज़र गयी,
लड़खड़ाते कदमो ने साथ छोड़ा ही था ,
कि सारी थकान मिटाती हुई , फिर एक शाम गुज़र गयी!
कुछ सपने सजाती हुई फिर एक शाम गुज़र गयी!

एक और दिन घर परिवार से बहुत दूर ,एक और दिन आंसुओं में छुपी यादों के बीच - फिर एक शाम गुज़र गयी!

यादों के शहर बसाती हुई,फिर एक शाम गुज़र गयी,
पलकों में अश्क छुपाती हुई, फिर एक शाम गुज़र गयी,
यूँ ही आना रहेगा मेरी यादों में तेरा,
नयी शाम का भरोसा दिलाती हुई,फिर एक शाम गुज़र गयी!
यादों के शहर बसाती हुई,फिर एक शाम गुज़र गयी!
कुछ सपने सजाते हुए फिर एक शाम गुज़र गयी!

और इस तरह हर शाम कल का भरोसा देते हुए वक़्त के साथ आगे बढ़ लेती है! पीछे मुड़ के उस शाम को देखने का वक़्त भी नहीं मिलता कि एक नयी शाम दिन भर का सफर बताने को तैयार मिलती है ! कभी यही शामें कुछ फुर्सत के लम्हों में हल्की सी मुस्कराहट या आँखों की नमी में खुद को महसूस कराती मालूम पड़ती हैं!

चलिए अभी इतना ही! मेरी भी इसी तरह एक शाम गुज़री तो सोचा इस शाम को सलाम करता चलूँ ! फिर मिलेंगे इसी TFT और LCD की दुनिया में , एक नयी शाम के इंतज़ार में !

- रोहित जोशी

Saturday, June 7, 2014

हिंदी क्यों ? ठीक है ! लेकिन हिंदी क्यों नहीं ?

कुछ दिन पहले संसद में शपथग्रहण समारोह के दौरान सांसदों को अलग अलग भाषाओँ में शपथ लेते देखा! ख़ुशी हुई , भारत की सांस्कृतिक विरासत का अदभुत दृश्य था!भाषा सांस्कृतिक विरासत का सबसे महत्वपूर्ण अंग माना जाता है! संसद में मानो सभी भारतीय भाषाओ का पूजन हो रहा था, भारत की विविधता का पूजन हो रहा था !मराठी, गुजराती,कन्नड़,ओड़िया,गुजराती इत्यादि और हाँ हिंदी भी! हिंदी ?
फिर अगले दिन एक टीवी चैनल पे बहस होती है की प्रधानमंत्री ने हिंदी में शपथ क्यों ली?प्रधानमंत्री ने यह फैसला क्यों लिया कि विदेशी दौरे पर भी हिंदी ही बातचीत की भाषा होगी! गुजराती,तमिल मराठी आदि भाषाएँ क्यों नहीं? हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं है! एक "बुद्धिजीवी" का कहना था कि विदेशी मामलो में हिंदी बोल के प्रधानमंत्री अपने वोट बैंक को संतुष्ट कर रहे हैं? हिंदी बोलने वाला वोट बैंक ? ये कब पैदा हुआ? आगे बढ़ कर वो बोलते हैं हिंदी सारा देश नहीं बोलता? प्रधानमंत्री हिंदी सब पर थोप रहे हैं?
यहाँ पर सरे बुद्धिजीवी यह भूल जाते हैं कि भारत में बोलने के साथ साथ निश्चित रूप से सबसे  ज्यादा समझने वाली भाषा हिंदी ही है! हिंदी कोई मिश्रित भाषा नहीं है!यह अपने आप में परिपूर्ण है! जब बुद्धिजीवी यह सवाल उठाते है कि हिंदी क्यों? तब इसका सबसे अच्छा उत्तर जो मेरे पास होता है वह है " हिंदी क्यों नहीं?"

क्षेत्रीय भाषा का सीधा सम्बन्ध उस समाज के अस्तित्व से है इसमें कोई दो राय नहीं है और इसका प्रचार प्रसार और संरक्षण उस क्षेत्रीय समाज की जिम्मेदारी है ! लेकिन हिंदी बचाने की जिम्मेदारी किसकी है? हिंदी किसकी भाषा है जब सभी की अपनी अपनी भाषा है? संस्कृत किसकी भाषा थी ? सबने अपनी भाषाएँ बना ली लेकिन संस्कृत की तरफ किसने देखा?यह सभी भाषाओं की जननी थी? कितना सम्मान मिला इसे ?अचानक से कैसे गायब हो गयी ?

यह बताना जरूरी हो जाता है कि यह बुद्धिजीवी तमिल भाषा के "समाजसेवी" थे!
3  साल चेन्नई में नौकरी करने वाले को समझ में आता है कि तमिल भाषायी हिंदी के प्रति कितने उदारवादी हैं?तमिलनाडु जहाँ सिर्फ दो तरह से लोगो को देखा जाता है - तमिल और हिंदी!आप भारत के किसी भी कोने से हो आप तमिल के लिए सिर्फ हिंदीवाला हैं! यह दोहरी मानसिकता क्यों?फिर वही बुद्धिजीवी हिंदी को इस तरह से क्यों देखते हैं? जब तमिलनाडु में सारे देश को हिंदी वाला और तमिलनाडु को तमिलवाला कहा जाता है?

मन में सवाल और बहुत सारे जवाब है लेकिन ज्यादा लम्बा लेख कोई पढता नहीं! इसलिए कभी विस्तार से कहीं और लिखने और बहस करने का मौका मिलेगा तो प्रयास किया जायेगा ! एक बात और है कि मैंने अंग्रेजी के बारे में नहीं लिखा! क्यों कि मुद्दा क्षेत्रीय भाषाओ और अकेली हिंदी का था! अंग्रेजी और हिंदी का संघर्ष कभी और लिखा जायेगा! यह बहुत बड़ा और कठिन संघर्ष है!

हिंदी को अकेला देख के दुःख हुआ तो लिखना जरूरी समझा! क्षेत्रीय भाषाएँ अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं लेकिन यह संघर्ष हिंदी से क्यों? आने वाला समय अंग्रेजी भाषा से संघर्ष का है! अस्तित्व बचाने का है! संस्कृत ने सभी भाषाओ को जन्मा है और हम उसे बचाने में असफल ही रहे हैं! क्यों? यह क्यों का उत्तर अगर मिल गया तो सारी भाषाओ का संरक्षण संभव है!

अभी इतना ही, कहना बहुत कुछ था पर फिर कभी! अभी हिंदी को कुछ सहारा दिया , खुश हूँ!

- रोहित जोशी

Monday, June 2, 2014

बेटी,परिवार समाज और सरकार !


दिन बीत गए बदायूं की घटना हुए , सोचा था निर्भया के बाद सरकार को अपनी जिम्मेदारियों का कुछ एहसास हो गया होगा लेकिन नहीं, सरकार आज भी हैं लेकिन बिना आत्मा के,हमेशा की तरह  !

 आज फिर एक बार सरकारी तंत्र एक परिवार के दुःख में अपनी रोटियां सेखने का कोई मौका नहीं छोड़ रहा ! बारी बारी से सभी अपने झूठे आंसुओं के साथ परिवार की ओर बढ़ तो रहे हैं लेकिन साथ में कैमरे और लिखित बयानों को ले जाना नहीं भूलते ! इससे एक कदम आगे बहन मायावती विमान सहित उतरती हैं और खुद को दलितों का मसीहा बताते हुए कुछ आंसू बहा लेती हैं ! तभी एक प्रश्न मन में उठता हैं कि अगर वो लड़कियां दलित ना होती तो माया बहन आंसू बहाने आती ? शायद नहीं ! बिलकुल भी नहीं ! उस परिवार की क्या दशा होगी जब हर 10 मिनट में एक अभिनेता (नेता) उन्हें एक बहुत ही बढ़िया अभिनय का नमूना पेश करता हो ! सब में होड़ लगी हैं कि कौन अच्छा अभिनेता हैं !

कुछ पंक्तियाँ परिवार की मनःस्थिति समझने की कोशिश करते हुए -

आंसू भी सूख गए अब तो,अब तुम आना बंद करो ,
बहुत हो गया अभिनय घर में, अभिनेता लाना बंद करो ,
दूर कहीं रहने दो हमको , अपने लोगो के साथ में ,
ये दुःख ही काफी हैं अपने,खेल खिलाना बंद करो !
बहुत हो गया अभिनय घर में ,अभिनेता लाना बंद करो!

अभी तो बढ़ रही थी वो,अभी तो पढ़ रही थी वो ,
सपने बिखर रहे थे उसके,फिर भी लड़ रही थी वो,
जाओ ले आओ वापस उसे,मुझे मनाना बंद करो,
खो गयी हैं बेटी मेरी,मुझे हसाना बंद करो !
ये दुःख हो काफी हैं अपने,खेल खिलाना बंद करो !
आंसू भी सूख गए अब तो,अब तुम आना बंद करो ,

उम्मीद हैं कभी ना कभी मीडिया परिवार के मन की स्थिति को समझ कर अपनी ना छूटने वाली क्रन्तिकारी हरकतों पे ध्यान देगा और कुछ रचनात्मक बदलाव करेगा! साथ ही उम्मीद कम हैं लेकिन हमारे राजनैतिक दलों को भी उस परिवार की तरह सोचना होगा और अभिनय से कोसों दूर रहते हुए सृजनात्मक बदलाव लाने होंगे !

अभी इतना ही इस उम्मीद के साथ कि समाज खुद अपने अंदर झांके और उपाय ढूंढें ! यही जरूरत भी है और समय का सन्देश भी !

- रोहित जोशी 

Friday, May 30, 2014

"वो" एक औरत !

आज फिर एक बलात्कार ! फिर एक दरिंदगी ! मोमबत्ती क्रांति कर लो लेकिन बिना मानसिकता बदले कैसे परिवर्तन लाओगे ? जितनी किसी की मानसिकता दोषी है उतना ही दोषी यह समाज है और उतना ही दोषी इस समाज का नजरिया! बलात्कार जिस्म ही नहीं मन को मारता है ! अंततः मरती औरत ही है , मरता उसका मन है !

एक प्रयास किया है कुछ पंक्तियों से उस औरत को समझने का ! उसके मन को पड़ने का,उसकी चिंताएं और दर्द समझने का ! "वो"  एक औरत !

आज फिर कहीं सुनसान में "वो" चीख भी दब जाएगी,
कुछ आंसुओं से होते हुए "वो" चुपके से सो जाएगी ,
हक़ीक़त से कहानी बनते वक़्त कहाँ लगता है,-2
फिर कहीं एक "वो" खुद को "नसीब" बनते पायेगी !
कुछ आंसुओं से होते हुए वो चुपके से सो जाएगी!

याद करती होगी वो भी, दूर अपने गाँव को ,
सूखे समाज की गर्मी और घर की छाँव को ,
जो दूर कहीं बैठी "वो"अब, खुद को कैसा पायेगी,
सिमटी अंधेरो में "वो" आज खुद से भी डर जाएगी
फिर कहीं एक "वो" खुद को "वो" बनते पायेगी!
फिर कहीं सुनसान में "वो" चीख भी दब जाएगी !

- रोहित जोशी

Thursday, May 29, 2014

बुद्धिजीवी और बुद्धिजीवी समाज



पहला लेख है हालांकि कवितायेँ और कुछ ग़ज़लें लिखी हैं लेकिन आजकल प्रचलन लेखो का है तो सोचा इसमें भी जोर आजमाइश की जाये !

ट्विटर में, टीवी में और समाज में एक अलग "प्रजाति" ने अचानक से जन्म लिया,जिसे अंग्रेजी में Intellectual और हिंदी में बुद्धिजीवी कहते हैं !सामान्यतः इन्हें किसी भी न्यूज़ चैनल में ज्ञान बांटते और क्रन्तिकारी हरकतें करते देखा जा सकता है ! यह समाज और समाजसेवी हमेशा ज्ञान से परिपूर्ण दिखाई देता है और लगातार किसी भी विषय पे बिना रुके थके ज्ञान बाटते चलता है ! मानो शिव जी की जटाओं से गंगा बह रही हो ! निस्वार्थ, स्वच्छ , निर्मल , पवित्र ! लेकिन इनमें से कोई भी शब्द वर्तमान के बुद्धिजीवी को परिभाषित नहीं करता ! ये अपना "मन" धन के हिसाब से बदलते रहते हैं ! इन्हें गंगा जी में मिलने वाले नाले के पानी के रूप में परिभाषित करना ज्यादा आसान और सम्पूर्ण रहेगा! चलिए आगे बढ़ते हैं -

बुद्धिजीवी या कहें Intellectual समाज दोनों शब्द स्वतः अपने लिए उपयोग करते हैं या किसी और से करवा लेते हैं और समाज की नज़रों में एक अलग जगह बनाने की कोशिश में दिखाई देते हैं !  दोनों ही भाषाओँ में यह शब्द कुछ ज्ञान या समझदारी का बोध कराता है लेकिन मौजूदा हालात और इस समाज की हालत देखते हुए आपको यकीन करना मुश्किल हो जाता है और सोच में पढ़ जाते हैं कि ऐसी कौन सी बाबा जी की बूटी थी जिसे पी के आज ये उस स्तर तक पहुंच गए ? आंकलन किया तो एक ही बात समझ आयी कि इन्हें कोई उत्तर दे तो कहाँ दे ? कैसे दे ? छरछरे पानी में बुलबुले तो बहुत से बन जाते हैं लेकिन देर तक नहीं रहते! बनते हैं और फूटते हैं , यही परिवर्तन है ! जो शायद अब महसूस हो रहा है !

वास्तव में भारत में तर्क और वितर्क किसी भी मुद्दे पे किया जा सकता है,यहाँ की जनता अपने में बहुत कुछ समेटे हुए है! पान की दूकान से ले कर चमचमाते शीशो के पीछे 8 से 5 की नौकरी करने वाले सभी  सारे मुद्दों पर तर्क वितर्क करने को तैयार रहते हैं ! सभी की राय अपने आप में अदभुत और अतुल्य है ! अनुरोध है कि सभी कि "राय" को दिग्गी चचा से जोड़ के ना देखा जाये ! आज सोशल मीडिया ने इस समाज को स्वयं भू बुद्धिजीवी समाज के सामने बहुत ही मजबूती से खड़ा कर दिया है! आज प्रतिस्पर्धा बुद्धिजीवी कुतर्क और अपने "आम" समाज के तर्क वितर्क के बीच है ! ख़ुशी है , गर्व है और भी बहुत कुछ है अब बाकी  भावनाएं समझ लीजिये !

अभी इतना ही , फिर लिखेंगे , फिर मिलेंगे !  TFT या LCD स्क्रीन पे फिर से मुलाकात होगी !

- रोहित जोशी